बेटी पढ़ाओ

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP): योजना अपने शब्दों से फिट बैठती है | इसका मतलब यह है की भारतीय महिलाओं के कल्याण के लिए सेवाओं की दक्षता में सुधार तथा जागरूकता उत्पन्न करना है |

हमारा मंत्र होना चाहिए: ‘बेटा बेटी, एक समान

देश में लड़कियों की निरंतर कम होती लैंगिक प्रवृति ने इस कार्यक्रम को शुरु करना बहुत आवश्यक बना दिया था। इसके उद्देश्य हैं:

  • बेटियों के जीवन की रक्षा, सुरक्षा और उच्च शिक्षा को सुनिश्चित करना।
  • उच्च शिक्षा और सभी कार्यक्षेत्रों में समान भागीदारी के माध्यम से महिला सशक्तिकरण को सुनिश्चित करना।
  • लिंग आधारित चयनात्मक परीक्षण का उन्मूलन करके बेटियों की रक्षा करना।
  • पूरे भारत में कन्याओं के स्तर को ऊँचा उठाना, विशेषतः 100 प्रमुख चुने गए जिलों में (जिनकी सी.एस.आर. कम है)।
  • लड़कियों के कल्याण के लिए एक साथ काम करने के लिए स्वास्थ्य एंव परिवार कल्याण मंत्रालय, महिला एंव बाल विकास मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक साथ लाना।
  • 0-6 वर्ष की आयु समूह की लड़कियों की संख्या लगातार कम हो रही है, 1991 की जनगणना के अनुसार 1000 लड़को के अनुपात में 945 लड़कियाँ थी, 2001 में 1000 लड़को के अनुपात में 927 लड़कियाँ थी और 2011 में 1000 लड़को के अनुपात में 918 लड़कियाँ थी। ये भारत की सरकार के लिए हल करने के लिए तेजी से बढ़ता खतरा है। ये योजना लड़कियों की संख्या कम होने के खतरे के सन्दर्भ में आया परिणाम है। ये खतरा देश में कुल महिला सशक्तिकरण की कमी का सूचक था। बाल लिंग अनुपात में कमी के कारण जन्म से पहले भेदभाव, चयनात्मक लिंग परीक्षण और उन्मूलन, जन्म के बाद भेदभाव, अपराध आदि है। 22 जनवरी 2015 को, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, भारतीय सरकार द्वारा, देश में लड़कियों की कम होती संख्या के मुद्दे को, संबोधित करते हुए शुरु की गई थी

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना का लक्ष्य एवं उद्देश्य

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना का संपूर्ण उद्देश्य बालिका के जन्म को एक उत्सव की तरह मानाना है ताकि पुराने और रूढ़िवादी विचारों को तोड़ा जा सके एवं उनके परिणामस्वरूप हो रहे लड़कियों के हितों के उल्लंघन पर लगाम लगाई जा सके। इस योजना को लड़कियों की शिक्षा और उनके कल्याण के प्रति लक्षित निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शुरू किया गया था:

  • बालिकाओं के प्रति भेदभाव एवं लिंग निर्धारण परीक्षण की कुरीति को खत्म करना
  • आज एशिया में महिला लिंग अनुपात में खतरनाक दर से गिरावट आती जा रही है। हमारा देश महिला दर में तेजी से गिरावट वाले देशों में शीर्ष स्थान पर है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना के तहत मुख्य रूप से महिला एवं पुरुष लिंगानुपात पर ध्यान केंद्रित किया गया है एवं लैंगिक भेदभाव की रोकथाम की दिशा में बड़े कदम उठाए जा रहे हैं।

  • लड़कियों के अस्तित्व एवं उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना
  • हमारे देश में समाचार पत्रों में आए दिन में खबरें छपती रहती है कि एक महिला भ्रूण कूड़ेदान में मिला या एक अजन्मी बच्ची रेलवे स्टेशन के पास अखबार में लिपटी हुई मृत पाई गई, इत्यादि। यह हमारे देश में क्या हो रहा है ? इससे हमारे समाज की बीमार मानसिकता का पता चलता है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना ऐसी मानसिकता को तोड़ने एवं हर बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

  • शिक्षा एवं अन्य क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी सुनिश्चित करना
  • एक बेहतर एवं मजबूत भारत बनाने के लिए महिला बच्चे को बचाएं एवं उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक, इस देश में हर बच्ची को शिक्षित किया जाना चाहिए ताकि उसे अपनी इच्छाओं का एहसास हो सके।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना की मुख्य विशेषताएं

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (बीबीबीपी) योजना की दो प्रमुख विशेषताएं हैं:


जन अभियान:

इस अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्ची का जन्म एवं उसका लालन-पालन बिना किसी भेद-भाव के उसके सशक्तिकरण के उद्देश्य से किया जाए ताकि वह इस देश की गौरवान्वित नागरिक बन सके। इस अभियान की शुरूआत तत्काल प्रभाव से समुदाय स्तर पर 100 जिलों और साथ ही राष्ट्रीय, राज्य तथा जिला स्तर पर किया गया है।

सीएसआर के साथ 100 चयनित जिलों में सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को सम्मिलित करते हुए (एक पायलट योजना के तौर पर)

मानव संसाधन विकास तथा स्वास्थ्य एवं परिवार मामले के मंत्रालयों ने लड़कियों की शिक्षा एवं अस्तित्व की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त रूप से कदम उठाए हैं। इसमें बीबीबीपी के प्रबंधन के लिए सभी विभागों में जिला कलेक्टर/ उपायुक्त स्तर पर बहक्षेत्रीय संयुक्त प्रयास सम्मिलित हैं।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा उठाए गए कदम:

  • गर्भधारण की पहली तिमाही के दौरान ही आंगनवाड़ी केंद्रों में गर्भधारण के पंजीकरण को बढ़ावा देना।
  • नई महिला उद्यमियों के प्रशिक्षण का कार्य।
  • सामुदायिक गतिशीलता और संवेदीकरण।
  • लैंगिक समर्थन की भागीदारी।
  • अग्रणी कार्यकर्ताओं एवं संस्थाओं को पुरस्कार एवं मान्यता प्रदान करना।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा उठाए गए कदम:

  • पक्षपात और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) अधिनियम, 1994 के कार्यान्वयन की निगरानी।
  • संस्थागत प्रसव में वृद्धि।
  • बच्चों के जन्म का पंजीकरण।
  • पीएनडीटी प्रकोष्ठों को मजबूत बनाना।
  • निगरानी समितियों की स्थापना।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा उठाए गए कदम:

  • लड़कियों का सार्वभौमिक नामांकन।
  • लड़कियों की पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर को कम करना।
  • स्कूलों में लड़कियों के साथ दोस्ताना, मिलनसार व्यवहार।
  • शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम को लागू करना।
  • लड़कियों के लिए कार्यात्मक शौचालयों का निर्माण।

हम व्यक्तिगत रूप से क्या कर सकते हैं:

  • परिवार और समुदाय में महिला बच्चे के जन्म पर खुशी जाहिर करना।
  • बेटियां हमारा गौरव हैं और इसलिए हमें उन्हें 'बोझ' या किसी और की संपत्ति समझने की प्रवृत्ति से परहेज करना।
  • लड़कों और लड़कियों के बीच समानता को बढ़ावा देने के तरीके ढ़ूढ़ना।
  • लड़कियों के प्रति रूढ़िवादी धारणा रखने वालों को चुनौती दें तथा को स्कूल में लड़िकियों के प्रवेश के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करें।
  • अपने बच्चों को लड़कियों एवं महिलाओं का सम्मान समाज के शिक्षित और जागरूक सदस्यों के रूप में करने की शिक्षा दें।
  • लिंग निर्धारण परीक्षण की किसी भी घटना की सूचना दें।
  • महिलाओं और लड़कियों के लिए सुरक्षित और हिंसा-मुक्त समाज निर्मित करने का प्रयास करें।
  • समुदाय और परिवार के भीतर साधारण विवाह को बढ़ावा दें एवं दहेज और बाल विवाह का विरोध करें।
  • महिलाओं के संपत्ति के वारिस होने के अधिकार का समर्थन करें।
  • महिलाओं को घर से बाहर जा कर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना उनके काम को उनके व्यवसाय को तथा सार्वजनिक स्थानों पर उनकी आवाजाही आदि को भी प्रोत्साहित करना।
  • महिलाओं और लड़कियों के प्रति संवेदनशील हों, मन में उनके कल्याण की भावना रखें।

हमें हमारे देश और हमारी संस्कृति पर हमेशा गर्व रहा है | हजारों वर्षों से हमारे देश ने किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया | हम शांतिप्रिय रहे हैं | जिन लोगों को दुनिया में कहीं स्थान नहीं मिला, चाहे यहूदी हो या पारसी, उन्हें भारत ने गले लगाया | ऐसी महान सांस्कृतिक विरासत होने के बावजूद हमारे समाज में एक ऐसी बुराई है जो आज पूरे संसार के सामने हमें हमारी नजरें नीची करने के लिए मजबूर कर देती हैं | वो बुराई है पुरुषों की तुलना में स्त्री को दोयम दर्जे का स्थान देना | हमारा समाज इतना ज्यादा पुरुषप्रधान हो गया है कि आज देश की जनसँख्या का बड़ा हिस्सा बेटी पैदा ही नहीं करना चाहता | इसीका नतीजा है कि हमारे देश में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या घटती जा रही है | 0-6 साल की उम्र के बीच प्रति 1000 लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या में वर्ष 1961 से लगातार गिरावट आ रही है| वर्ष 1991 में लड़कियों की संख्या जहाँ 945 थी वहीँ 2001 में यह घटकर 927 और 2011 में 918 हो गई | यह हम सब के लिए एक भयंकर चिंता का विषय है | इसी वजह से हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने “बेटी बचाओ, बेटी पढाओ” ( Beti Bachao essay in Hindi ) योजना की शुरुआत २२ जनवरी २०१५ को हरियाणा के पानीपत से की |

“बेटी बचाओ, बेटी पढाओ” योजना को एक राष्ट्रीय अभियान के माध्यम से कार्यान्वित किया जाएगा | सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से उन 100 जिलों का चयन किया जाएगा जहाँ बाल लिंग अनुपात सबसे कम है और फिर वहां विभिन्न क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित कर कार्य किया जाएगा | यह योजना महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संयुक्त पहल है । इसका मुख्य उद्देश्य है कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम, बालिकाओं के अस्तित्व को बचाना, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा बालिकाओं की शिक्षा और भागीदारी सुनिश्चित करना | यह योजना न केवल लड़कियों बल्कि पूरे समाज के लिए एक वरदान साबित हो सकती है । इतना ही नहीं, “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” ( Beti Bachao essay in Hindi ) योजना ऐसे वक्त आई है जब देश महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं जैसे- दुष्कर्म और अन्य तरह के हमलों का सामना कर रहा है | इसलिए इस योजना का महत्व और भी बढ़ जाता है |

वर्तमान समय में अजन्मे बच्चे के लिंग का पता लगाने की सुविधा आसानी से उपलब्ध है | इस वजह से कन्या भ्रूण हत्या के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है | लोग सोचते हैं कि लड़का बड़ा होकर पैसा कमाएगा । लड़की इसके विपरीत, दहेज़ लेकर घर से जाएगी | इस तरह के आर्थिक कारणों से लड़कियों के विरुद्ध सामाजिक पक्षपात होता रहा है | समाज में गहरे तक यह बात बैठी हुई है कि लड़कियाँ पैदा होते ही बड़ी जिम्मेदारी गले आ जाती है | इन कारणों से लिंगानुपात को नुकसान पहुँचा है | महिलाओं के जन्म से पहले ही उनके अधिकारों का हनन शुरू हो जाता है तथा जन्म के बाद भी उनके साथ भेदभाव नहीं थमता | स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा की जरूरतों को लेकर उनके साथ कई तरह से पक्षपात होता है | लड़कियों को बोझ की तरह देखा जाता है जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है | महिला सशक्तिकरण से समाज को पिछड़ेपन से मुक्ति मिलती है | एक शिक्षित महिला अपने साथ अपने पूरे परिवार को आगे ले जाती है | इसलिए आज के समय में यह जरूरी है कि लड़कियों को लेकर शहरी तथा ग्रामीण भागों के लोगों के बीच फैली अंधविश्वासी मान्यताओं और प्रथाओं को ख़त्म किया जाए | इसके लिए मीडिया और संचार के नए तरीकों का पूरी तरह से इस्तेमाल करने की आवश्यकता है | बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ( Beti Bachao essay in Hindi ) अभियान इसी लक्ष्य को हासिल करने, इसके बारे में जागरूकता फैलाने और लोगों की मानसिकता में बदलाव लाने के लिए शुरू किया गया है |

“बेटी बचाओ, बेटी पढाओ” ( Beti Bachao essay in Hindi ) सिर्फ एक योजना नहीं बल्कि देश के हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है । यदि एक समाज के रूप में हम इस समस्या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे, तो हम अपनी ही नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए भी एक भयंकर संकट को निमंत्रण देंगे | इसलिए यह आवश्यक है कि एक नागरिक के रूप में हम सचेत रहे | कहीं पर भी कन्या भ्रूण हत्या हो रही हो तो तुरंत इसकी जानकारी पुलिस को दें | लोगों को इस बारे में सजग करे | हमारा समाज अबोध बालिकाओं की हत्या का पाप और नहीं झेल सकता |

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना की जरूरत क्यों?

2011 की ताजा जनगणना से 0 से 6 वर्ष आयु समूह में सीएसआर घटने का खुलासा हुआ है। हर 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या घटकर 919 रह गई है। 2001 में 1,000 लड़कों पर 927 लड़कियां थी।

अजन्मे बच्चे के लिंग का पता लगाने वाले आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता से कन्या भ्रूण हत्या के मामले बहुत तेजी से बढ़े हैं। आर्थिक फायदों को लेकर लड़कों के प्रति सामाजिक पक्षपात होता रहा है। समाज में गहरे तक यह बात बैठी हुई है कि लड़कियों के साथ बड़ी जिम्मेदारी आती है। इन कारणों से लिंगानुपात को नुकसान पहुंचा है।

जन्म हो जाने के बाद भी लड़कियों के साथ भेदभाव नहीं थमता। स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा की जरूरतों को लेकर उनके साथ कई तरह से पक्षपात होता है।

इस वजह से, ठीक ही कहा जाता है कि महिलाओं के जन्म से पहले ही उनके अधिकारों का हनन शुरू हो जाता है। समन्वित रूप से, हकीकत यह भी है कि महिला सशक्तिकरण से समाज में विश्वास और अवैज्ञानिक प्रथाओं के पिछड़ेपन से मुक्ति मिलती है। अंधविश्वासी मान्यताओं और प्रथाओं तक सीमित ग्रामीणों के बीच से आगे निकलने के लिए नए मीडिया और संचार तरीकों का पूरी तरह से इस्तेमाल करने की आवश्यकता है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान इसी लक्ष्य को हासिल करने, इसके बारे में जागरूकता फैलाने और बदलाव के लिए शुरू किया गया है।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना पूरे समाज के लिए एक वरदान है।

इस बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय जैसे अन्य मंत्रालयों के साथ मिलकर काम कर रहा है।

यह योजना न केवल लड़कियों बल्कि पूरे समाज के लिए एक वरदान साबित हो सकती है। इतना ही नहीं, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना ऐसे वक्त आई है जब देश महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं जैसे- दुष्कर्म और अन्य तरह के हमलों का सामना कर रहा है। सरकार ने यह दावा भी किया है कि गृह मंत्रालय बड़े शहरों में महिला सुरक्षा बढ़ाने की योजना पर 150 करोड़ रुपए खर्च करने वाला है।

केंद्रीय बजट में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा की पायलट योजना के लिए 50 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। यह एक स्वागत योग्य कदम हो सकता है क्योंकि इसके जरिए सिस्टम पर महिलाओं का भरोसा फिर से कायम किया जा सकता है।

यदि परियोजना दुर्जेय हो तो बेहतर शुरुआत और कार्यान्वयन के लिए कई सबसे प्रभावी तरीकों को गले लगाया जा सकता है। उदाहरण के तोर पर पश्चिम बंगाल में एक प्रणाली है, जिसमें बच्चे की शिक्षा के लिए एक निश्चित अंतराल के नकद पैसा ट्रांसफर किया जाता है। पंजाब में, गर्भवती लड़कियों को पहली तिमाही में ही रजिस्टर किया जाता है। ताकि अधिकारी भ्रूण हत्या के मामलों पर निगरानी रख सके। एक उदाहरण तमिलनाडु में भी है, जहां अम्मा बेबी केयर किट दी जाती है।

झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई

झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत की आज़ादी की लड़ाई में अपना बहुत बड़ा योगदान दिया। एक महिला होते हुए भी उन्होंने अपने पराक्रम से ब्रिटिश राज को ललकारा और उनसे लड़ते हुए वो वीरगति को प्राप्त हुई।सन 1857 के भारतीय विद्रोह में उन्होंने साहस के साथ ब्रिटिश राज का सामना किया था। उनके साहस और पराक्रम को आज भी पूरा विश्व याद करता है।

सरोजिनी नायडु

सरोजिनी नायडु पहली भारतीय महिला कॉग्रेस अध्यक्ष और ‘भारत की कोकिला’ इस विशेष नाम से पहचानी जाती है, क्योंकि इन्होंने एक राष्ट्रिय नेता के रूप में भाग लेने के साथ-साथ काव्य के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

मदर टेरेसा

मदर टेरेसा एक रोमन कैथोलिक सन्यासिनी और ईसाई धर्म प्रचारक थी। उन्होंने ईसाई धर्म प्रचारको की स्थापना की थी, जिनका मुख्य उद्देश्य रोमन कैथोलिक धर्मो को एकत्रित करना था, उनकी संस्था है जिसमे सन 2012 तक 4500 भागिनियाँ जुडी और 133 देशो में उनकी यह संस्था आज भी सक्रीय है। गंभीर बीमारियों से ग्रसित लोगो, गरीब और अनाथ बच्चो को भी उनकी संस्था सहारा देती है और गरीब और अनाथ बच्चो को स्कूल में पढ़ाती भी है। उनकी संस्था का एक ही उद्देश्य है की वे दुनिया के गरीब से गरीब इंसान की भी मुफ्त में सेवा करना चाहते है।मदर टेरेसा को बहुत से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमे 1979 में मिला नोबेल शांति पुरस्कार भी शामिल है। 19 अक्टूबर 2003 को उन्हें “कलकत्ता की भाग्यवान टेरेसा” की उपाधि भी दी गयी थी। इसके बाद दिसम्बर 2015 में पॉप फ्रांसिस ने के रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा उन्हें संत की उपाधि दी गयी थी। संत बनने की उनकी विधि 4 सितम्बर 2016 को हुई थी।

लता मंगेशकर

लता मंगेशकर एक भारतीय प्लेबैक सिंगर और म्यूजिक कंपोजर है। वह भारत की एक सबसे प्रसिद्ध, बेहतरीन और सम्मानित प्लेबैक सिंगर है। लता मंगेशकर का करियर 1942 में शुरू हुआ था और आज लगभग उन्हें 7 दशक पुरे हो चुके है। उन्होंने तक़रीबन 1000 से ज्यादा हिंदी फिल्मो के लिये गाने गाए है और तक़रीबन 36 देसी स्थानिक भाषाओ में गायन भी किया है और साथ ही उन्होंने विदेशी भाषाओ में भी गायन किया है। मुख्यतः Lata Mangeshkar ने मराठी और हिंदी भाषा में गीत गाए है। भारत सरकार द्वारा भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च अवार्ड दादासाहेब फालके अवार्ड उन्हें 1989 में देकर सम्मानित किया गया था। एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के बाद वह दूसरी गायिका है जिन्हें भारत के सर्वोच्च अवार्ड भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।

आंग सान सू ची

आंग सान सू की (जन्म : 19 जून, 1945) म्यांमार (बर्मा) की एक राजनेता, राजनयिक तथा लेखक हैं। वे बर्मा के राष्ट्रपिता आंग सान की पुत्री हैं जिनकी १९४७ में राजनीतिक हत्या कर दी गयी थी। सू की ने बर्मा में लोकतन्त्र की स्थापना के लिए लम्बा संघर्ष किया।
आंग सान को १९९० में राफ्तो पुरस्कार व विचारों की स्वतंत्रता के लिए सखारोव पुरस्कार से और १९९१ में नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया है। १९९२ में इन्हें अंतर्राष्ट्रीय सामंजस्य के लिए भारत सरकार द्वारा जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया

इंदिरा गांधी

इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी – भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस का केंद्र बिंदु भी थी। इंदिरा गांधी जिन्होंने 1966 से 1977 और बाद में फिर से 1980 से 1984 में उनकी हत्या तक उन्होंने देश की सेवा की। Indira Gandhi भारत की सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहने के मामले में दुसरे स्थान पर थी और प्रधानमंत्री कार्यालय सँभालने वाली वो अब तक की अकेली महिला रही है।

back button